मेरे कल्पनाओं के शहर में

मेरे कल्पनाओं के शहर में, एक हल्की पीली रोशनी से जगमग किसी छोटे से कैफ़े में, तुम मेरे सामने बैठे हो।
अबकी बार ये जगह पहाड़ो पर नहीं, बल्कि समन्दर किनारे किसी एक शहर में है, जहाँ हम मुदत्तों से जाने की सोच रहे थे। पीछे किसी और भाषा का संगीत बज रहा है। बोल हम समझ नहीं पा रहे पर उसकी धुन पर तुम अपनी उँगलिया टेबल पर थिरका रहे हो। साथ ही तुमसे अब खाने का इंतज़ार नहीं हो रहा, तो तुम्हारा ध्यान भटकाने के लिए मैं छेड़ देती हूँ कोई एक पुराना क़िस्सा।
मेरे कल्पनाओं के शहर में, जो तुम मेरे सामने बैठे हो, तो तुम्हें याद है बीते सालों का सब कुछ। गहरी, हल्की-फुल्की सारी बातें। तुम्हारे मुझसे पूछे गए ऊल जुलूल सवाल और मेरे उनके और भी टेढ़े-मेढ़े उत्तर।
हमारे बीच हुए कुछ संवादों में तो तुम्हें कमरे की दीवार, मेरी बिंदी का रंग, आस पास के लोग, सड़क का रुख़, शहर का मौसम और हवाओं की महक तक याद है।
इन्फ़ैक्ट तुम मुझे याद दिला रहे हो की मैंने कब किससे क्या कहा था!
मेरे कल्पनाओं के शहर से बाहर निकलकर जब में वर्तमान में आती हूँ तो तेज़ सफेद लाईट से रोशन एक कमरे में, मैं तुम्हारे सामने बैठी हूँ।
ये जगह ना पहाड़ों पर है और ना किसी समंदर किनारे। और पीछे संगीत नहीं पर कुछ मशीनों की आवाज़ आ रही है।
मैं पाती तो हूँ तुम्हें, पर हमारी उन तमाम बातों को तुम शायद थोड़ा भूल से गए हो। या उथल पुथल हो चुकी हैं कुछ यादें। समय, तिथि और वार भी सब थोड़ा आगे पीछे से हो गए हैं। कुछ वैसे ही जैसे तेज आंधी के बाद कनेर के पेड़ के नीचे से तुम उठा के दिया करते थे तुम मुझे गुड़हल के फूल, और बेल की टहनियों पर दिखाते थे झूमते हुए हरश्रृंगार के फूल।
इन आगे पीछे हुईं यादों को में कुछ सुलझाती हूँ। तुम्हें थोड़ा याद दिलाती हूँ, एक श्रृंखला मैं लगाती हूँ। पर तुम फिर भूल जाते हो। ऐसा हम आजकल दिनभर करते हैं। एक बार, कई बार और बार बार।
फिर मैं वापस आपनी आँखें खोलती बंद करती हूँ, करने के लिए एक यात्रा इस शहर से वापिस उस शहर में। सिर्फ़ इस उम्मीद में कि इस शहर के तुम को मिलवा सकूँ उस शहर के तुमसे और निकाल सकूँ तुम्हारे मन को इन ग़फ़लतों से।
वैसे मेरे भीतर का एक हिस्सा ये जानता है, कि ऐसा कुछ करने से कोई अंतर आयेगा नहीं।
पर फिर भी मैं बार-बार अपनी आँखे खोलती बंद करती हूँ, और बीच में थोड़ा मुस्कुरा भी लेती हूँ, देख कर बस एक चीज़,
कि अभी भले तुम्हें याद ना हो बहुत कुछ। पर मेरे कल्पनाओ के शहर की तरह , यहाँ भी हर बार पातीं हूँ कि तुम मेरे सामने ही बैठे हो!
September, 2026





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