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दिन, महीने और साल

  • Writer: Pahadan
    Pahadan
  • 2 hours ago
  • 2 min read

प्रिय रूमी,

तुम्हारी उम्र को मैं अब तक दिन, हफ़्ते और फिर महीनों में बताया करती थी। पर आज तुमने इस दुनिया में 6 महीने, या यूँ कहूँ कि आधा साल बिता लिया है।

6 महीने पहले हमने एक यात्रा शुरू की थी, तुमने मेरी औलाद और मैंने तुम्हारी माँ के रूप में।ये पूरा समय हमारा एक दूसरे के साथ ही निकला।

हम अक्सर अंदर वाले कमरे में एक दूसरे से चिपके हुए पाये जाते या फिर बाहर बरामदे मे पौधों को बढ़ता, चिड़ियों को चहचहाता या असमान को रंग बदलता हुए देखते मिलते।

वैसे इन गतिविधियों के संग हमने हज़ारो संवाद भी किए, जिसमें शब्द थोड़े कम थे पर थी कुछ धुनें, कुछ आँसू, कुछ मुस्काने, कुछ अंगड़ाइयाँ और बहुत सारा स्पर्श।


आज आधा साल पूरा करने पर सब खुश थे, और मुझे भी बधाइयाँ दी जा रही थी, लेकिन सच बताऊँ मेरा दिल बैठ सा रहा था। यूँ तो हर दिन तुमने मेरी गोद में ही गुज़ारा है पर फिर भी जाने क्यों ये समय कम ही लगता रहा। तुम्हारा यूँ जल्दी जल्दी बड़ा होना, मुझे पीछे छूट जाने का एक डर भी तो दे जाता है।

क्योंकि मुझे पता है कि हर एक आगे बढ़ते दिन में मैं तुम्हें मेरे बिना रहने के लिए ही तो सक्षम बना रही हूँ।

पर ये भी है कि हमेशा से प्रकृति में ऐसा ही तो होता आया है।


वैसे इस बीच मुझे पिता की एक बात बहुत याद आई।

वो अक्सर मुझसे कहते थे, “तुम छोटी सी कितनी अच्छी लगती थी, उतनी ही क्यों नहीं रह गई?”

तब मुझे लगता था ये क्या बात करते है, भला क्यों ही रह जाती मैं छोटी!

पर जानते हो पिता की वो इक्छा आज समझ आती है, जब मैं ख़ुद समय को स्थिर करना चाहती हूँ हर उस पल जब तुम सारी दुनिया छोड़कर मेरी गर्दन में अपने चेहरे को छिपाने की कोशिश करते हो, या मेरी गोद ही होती है तुम्हारा एक घर, या जब लोगों से भरे कमरे में घूम फिर कर तुम्हारी नज़र ठहरती है सिर्फ़ मुझ पर। और उस वक्त भी जब तुम रोते, ख़ुद से लड़ते हुए, सिमट जाते हो मुझमें ताकि तुम्हें एक चैन की नींद मिल सके।

खैर,

समय को रोकने में सालों पहले ना पिता सक्षम थे और ना ही आज मैं इस रोक पाऊँगी।

हाँ, पर मैं ख़ुद को तो ज़रा रोक सकती हूँ, ताकि तुम्हारे साथ थोड़ा और जी लूँ, तुम्हें गोद में थोड़ा और थाम लूँ, ज़रा देर चिपका के और सो लूँ, तुम्हारी आँखो में अपने चेहरे को थोड़ा और देख लूँ, तुम्हारे माथे को थोड़ा और चूम लूँ, या कुछ नहीं तो खामोशी में तुम्हारे गालों को अपने गालों से थोड़ी और देर के लिए सटा लूँ।


पर रूमी, समय की हमेशा अपनी निश्चित गति होती है। लेकिन उसमें आईं परिस्थितियाँ ही तो होती हैं जो समय को लंबा या कम महसूस कराती हैं। मुझे पता है तुम्हारे जीवन के ये शुरुआती पल, दिन, हफ़्ते, महीने जो अब साल होने को चलें हैं, इनमें दिन चौबीस की जगह अगर अड़तालीस घंटों का भी होगा, तब भी वो मेरे लिए कम ही होगा।

शायद इसी को मोह का बंधन कहते हैं,

जिसमें तुमने मुझे बड़ी ही आसानी से थाम लिया है।

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