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गले लगाना

  • Writer: Pahadan
    Pahadan
  • 2 minutes ago
  • 1 min read

कितना भिन्न होता है

गले लगना और गले लगाना।

कैसे जकड़ने भर की ताक़त बता जाती है

कहे अनकहे तमाम भाव।


दौड़ते आते हुए गले लगाने में

हर कदम ख़त्म होता है

दिन, महीने और कभी-कभी सदियों का इंतज़ार।


अलविदा लेते हुए गले लगाने में

झलक जाती है इक्छा

बस एक पल और ठहरने की।


दुख में गले लगाने से

कम तो हो जाती हैं कुछ पीड़ाएँ

वहीं सुख में गले लगाने से

बढ़ जाती है थोड़ी ख़ुशी।


मैं जब तुम्हें गले लगाती हूँ

तो छुप जाती हूँ

तुम्हारे हृदय के एक कोने में

और छोड़ आती हूँ

अपनी सारी मायूसी।


और जब तुम मुझे गले लगाते हो,

तब मैं तो ख़त्म हो जाती हूँ

तुम्हारे काँधे से पहले ही।

पर मेरे सिर पर

टीकाकर अपनी ठुड्डी,

 तुम एक इंद्रधनुष की तरह

समेट लेते हो मुझे

बस यूँही!


तभी तो कहती हूँ,

कितना भिन्न होता है

गले लगना और गले लगाना।



 
 
 

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