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प्रिय रूमी,

  • Writer: Pahadan
    Pahadan
  • Nov 30, 2025
  • 4 min read

आज हमने एक दूसरे के संग एक पूरा महीना बिता लिया। ये दुनिया में तुम्हारा पहला माह था|

इन दिनों में कुछ ने पूछा मुझे कैसा लग रहा है, पर मैं कुछ बता ही नहीं पायी। शायद शारीरिक कष्ट और मानसिक उथल पुथल में भावनात्मक अभिव्यक्ति कहीं उलझ गई थी।

पर हाँ, कठिन था मेरे लिए तुम तक पहुँचना. तुम्हारे समय से पहले आ जाने के बाद भी मैं तुमसे जल्दी मिल ही नहीं पायी।

मैंने कल्पना करी थी हमारी पहली मुलाक़ात की पर वैसा कुछ भी नहीं हुआ।


NICU के पहले चार दिन तक तो मैंने चुना तुम्हारे पास ना जाना। मुझे डर था, कहीं मैं तुम्हें कोई नुक़सान ना पहुँचा दूँ। तब मैंने तुम्हें देखा विनायक की नज़रो से। हर बार जब वो तुम्हें देख कर आता, तो बताता की तुम कैसे दिखते हो, तुम्हारे बाल कितने है या एक छोटे से काँच के फ्रेम के भीतर तुम किस प्रकार का मुंह बना रहे हो। फिर एक रोज़ मैंने तुम्हें देखा दूर से, तब मुझे कुछ महसूस नहीं हुआ। उस वक्त भी मैंने तुम्हारी कोई छवि बनाई नहीं, और ना ये इक्छा रखी की हम जल्द ही मिलें। शायद तब तुमसे मिलने से बड़ा था मेरे लिए तुम्हारे सुरक्षित होने का ख्याल।

और फिर पाँचवे दिन, नर्स ने मुझे तुम्हें दिया। तुम्हें लेने से पहले मैंने दो बार रगड़ के अपने हाथ धोए, और बड़ी हिम्मत करके अपने कापतें हुए हाथ बढ़ाए। अस्पताल का सफेद कंबल ओढ़े, एक गुलाबी चेहरा जैसे ही मेरी हाथों में आया, तुमने हल्की से अंगड़ाई ली और हमारी नज़रें मिलीं।

तुम्हारी वो गहरी आँखें जैसे मुझसे पूछ रहीं हो, “अब तक कहाँ थीं?” मैं तुम्हारे इस सवाल का जबाब में मैं कुछ शब्द पिरोह ही रही थी की , तुमने अपना बायाँ हाथ निकालकर मेरी उँगली पर लिपटा लिया। और तब वही उस पल मैं टूट जाना चाहती थी याद करके तुम तक पहुँचने की हमारी पूरी यात्रा उसी बीच मेरे आँसू तुम्हारे उस कंबल पर गिर पड़े।


तुमने एक बार फिर मुझे देखा और मेरी गोद में तुम सो गए।

उस वक्त मैं तुम्हें गले लगाना चाहती थी, तुम्हारे माथा चूमना चाहती थी। पर इस डर से कि कहीं मैं तुम्हें कोई नुकसान ना पहुँचा दूँ, मैंने तुम्हें नर्स को वापिस पकड़ाया

और चली आई।

तब मैंने किसी से बात करना नहीं चाहा, बस मैं ख़ुद को, तुमको और अभी अभी बिताये हमारे उस पल को बार बार जीना चाहती थी।

उस दिन हमारी मुलाक़ात को सोचते हुए मुझे

रूमी की एक पंक्ति याद आई,

I once had a thousand desires,

But in my one desire to know you

all else melted away.”

और तब ही से, तुम मेरे लिए रूमी हुए!


एक हफ़्ते बाद, तुम्हारे घर आने वाले दिन, जहाँ सब उत्साहित दे, मैं डरी हुई थी। अस्पताल से घर तक, मैं तुम्हें अपनी गोद में ऐसे रखकर लायी जैसे केक के डब्बे को ले जा रही हूँ, की मेरा जरा सा हिलना भी तुम्हें नुक़सान पहुँचा देगा। हाँ, मुझे डर लग रहा था, वो भी इतना ज़्यादा की घर में पहली रात मैं पूरे समय सिर्फ़ तुम्हें देखती रही और ये की तुम्हारी साँसे चल रही हैं ना। रूई से हल्के और नाजुक तुम्हें उठाते हुए भी मुझे डर लगता था।

वैसे इस एक महीने में, मैंने सिर्फ़ तुम्हारे साथ वक्त बिताया, और फिर भी ना जाने क्यो दिन भर संग रहने के बाद भी मुझे ऐसा ही लगा की मैं तुम्हारे साथ कम समय बिता ही नहीं पायी। कठिन था ये महीना हम दोनों के लिए। तुम्हारा इस संसार को अपनाना। और मेरा इस बात को अपनाना की अब मेरी एक औलाद है।

इस बीच मैंने बहुत याद किया पिता को भी।कई लोगो ने कहा की तुममें वो ही वापिस आ गए हैं। अब इस बात का सत्य तो कोई नहीं बता सकता पर मैंने बस यही सोचा वो होते तो उन्हें तुमसे मिलकर क्या कहते।


इस पहले महीने में, तुम तो ज़्यादा समय सोते रहे, पर मैं जागती रही और तुम्हें तकती रही।

समय को रोकने की इतनी प्रबल इच्छा मेरी कभी नहीं हुई, जितनी इन बीते दिनों में।

मैं समय को रोकना चाहती थी, उस पल जब मैंने तुम्हें पहली बार थामा, या तब जब तुमने पहली बार धूप महसूस करके अपनी आँखें मीच ली थी। मैं रोकना चाहती थी समय को रात के ३ बजे, जब उस सन्नाटे में बस हम दोनों जागते रहे, या उस समय भी जब तुम्हारे गुनगुने गालों से मैं गालो को छिबाती। मैंने समय को रोकना चाहा तब भी जब तुमने मुझसे सट कर सोना चाहा या शायद मैंने तुमसे चिपक कर रहना चुना।


बीते इन दिनों ने मुझे काफ़ी मौन भी किया। यूँ तो हमने दिन भर संवाद किया, पर उसमे ना तो शब्दों की ज़रूरत पड़ी ना किसी ध्वनि की। और हाँ स्पर्श में इतनी ताक़त होती है, इस बात का एहसास तो तुम्हें पाने के बाद ही हुआ।

रूमी, ये महीना तमाम उथल पुथल लेकर आया, पर संग लाया बहुत सारा धैर्य और प्रेम!

जानते हो,

प्रेम की तमाम भाषाओं को जानने के बाद मेरा परिचय हुआ तुमसे और फिर मेरी बीती सभी परिभाषाओं के अर्थ ही बदल गए!


09/10/25




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